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Need to Increase Citizen Participation in Urban Ecology Projects

जयपुर की द्रव्यवती नदी, इंदौर की कान्ह नदी, लखनऊ की गोमती, चेन्नई की कूउम नदी जैसी कई नदी पूर्णद्धार परियोजनाएं भारत के शहरों को एक नई पहचान देने की और अग्रसर हैं|

नदियों में स्वच्छ, अविरल जल धारा एक तो भू-जल की हालत को सुधारेंगी और दूसरा लुभावने रिवर फ्रंट यानि नदी के किनारे लोगों को पर्यटन, आमोद-प्रमोद का नया विकल्प उपलब्ध कराएंगे|

पर इन परियोजनाओं के विषय में एक बड़ा सवाल यह है की इनका उस शहर के निवासियों, उनके अनुभवों, उनकी जरूरतों से कितना जुडाव है| जैसे क्या नदी के दायरे में आने वाली बस्तियों और उन में रह रहे लोगों के पुनर्वास और रोज़गार को गंभीरता से लिया जाता है? क्या प्राकृतिक संसाधनों से जुडी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में नागरिकों की राय लेने पर ज़ोर दिया जाता है?

विकास के मामलों में ये प्रमाणित बात है की जिन कार्यों में नागरिकों को किसी भी रूप में भागीदार बनाया जाता हैं वे कार्य लम्बे समय तक उपयोगी साबित होते हैं, और उनकी सुव्यवस्था और सुसंचालन के लिए सरकार को कम प्रयास करने पड़ते हैं|

आज भारत में शहरीकरण की रफ्तार बेहद तेज़ है| देश के इतिहास के किसी भी काल के मुकाबले आज अधिक लोग शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं, और अनुमानतः 2050 तक भारत के शहरों में 40 करोड़ व्यक्ति समा जायेंगे|

अंधाधुंध शहरीकरण का एक मायना यह है की हमारे शहर वायु प्रदूषण, पेयजल की उपलब्धता, कचरा निस्तांतरण और पर्यावरण-जनित बीमारियाँ जैसे डेंगू और चिकनगुनिया जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं|

पर गौर करने की बात ये है, की इन पर्यावरणीय समस्याओं के उत्तर में शहरी नीति निर्माताओं और आम नागरिकों में प्रकृति से जुडी जागरूकता, और उसके निकट पहुँचने की उद्द्येलना भी साफ़ जाहिर हो रही है|

हरियाली और वृक्षारोपण को तरजीह, शहर के आस-पास बचे जंगलों के प्रति संवेदनशीलता, नदी और तालाबों का पूर्णद्धार, बर्ड-वाचिंग जैसे प्रयास, और साथ ही बिजली से चलने वाले वाहन, घरों की छत पर सौर ऊर्जा संयंत्र, वर्षा जल संरक्षण और स्कूली शिक्षा में प्रकृति-परक विषयों पर ज़ोर, शहरी नागरिकों का पर्यावरण संरक्षित करने का कुछ प्रयास तो झलकता है|

ऐसे में प्रकृति-परक परियोजनाओं में जन भागीदारी बढ़ा कर इस झुकाव को एक व्यापक, जन मानस के व्यवहार परिवर्तन में बदला जा सकता है|

A version of this article published in Dainik Bhaskar on 14 April, 2017